अबैकस(Abacus) से एल्गोरिथम तक: पारंपरिक गणना विधियाँ कैसे आकार देती हैं गणितीय दिमाग

आपके हाथों में प्राचीन ब्रेन-जिम(abacus)

अबैकस(abacus) और एल्गोरिथम—उनके दिमाग को गहराई से अलग-अलग तरीकों से आकार दे रहे हैं। यह खोज इस बारे में नहीं है कि कौन सा बेहतर है, बल्कि यह कि प्रत्येक प्रणाली तंत्रिका मार्गों को कैसे वायर करती है, संज्ञानात्मक विकास को कैसे प्रभावित करती है, और क्यों दोनों मानवता के गणितीय विकास में महत्वपूर्ण मील के पत्थर का प्रतिनिधित्व करते हैं।

भाग 1: अबैकस का असर – हाथों से सीखने की ताकत

जब कोई बच्चा अबैकस का इस्तेमाल करता है, तो उसके दिमाग में कुछ खास होता है। अबैकस एक लकड़ी का फ्रेम होता है जिसमें मनके लगे होते हैं और इन मनकों को हिलाकर गणना की जाती है। इस प्रक्रिया में बच्चा अपनी आँखों से मनकों की स्थिति देखता है, उंगलियों से उन्हें छूता और हिलाता है, और कई बार मनकों के टकराने की आवाज भी सुनता है। यानी वह देखता है, छूता है, हिलाता है और सुनता है – चारों इंद्रियाँ एक साथ काम करती हैं। इससे दिमाग का वो हिस्सा सक्रिय होता है जो संख्याओं और जगह को समझने का काम करता है। दिमाग का वो हिस्सा भी काम करता है जो उंगलियों की हलचल को नियंत्रित करता है। और सबसे अच्छी बात यह है कि जो बच्चे लंबे समय तक अबैकस का इस्तेमाल करते हैं, वे बिना अबैकस के भी मन में ही मनकों की तस्वीर बनाकर गणना करने लगते हैं। इसे ‘मानसिक अबैकस’ कहते हैं। वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि इससे दिमाग का दायाँ हिस्सा, जो आमतौर पर गणित के काम में कम सक्रिय रहता है, ज्यादा सक्रिय होता है और दिमाग के विभिन्न हिस्से आपस में बेहतर तरीके से जुड़ते हैं।

जापान में हुए शोध से पता चला है कि जो लोग अबैकस का नियमित अभ्यास करते हैं, उनके दिमाग में ग्रे मैटर नामक पदार्थ की मात्रा बढ़ जाती है, जो दिमाग की कार्य क्षमता बढ़ाता है। ऐसे लोग कैलकुलेटर इस्तेमाल करने वालों से भी तेज गणना कर सकते हैं और उनकी याद रखने की क्षमता भी बेहतर होती है।

भाग 2: एल्गोरिथम का असर – क्रमबद्ध सोच का विकास

एल्गोरिथम का मतलब है किसी काम को छोटे-छोटे चरणों में बाँटकर करना। जैसे अगर हमें 23 को 47 से गुणा करना है, तो हम पहले 23 को 40 से गुणा करेंगे, फिर 23 को 7 से गुणा करेंगे, और फिर दोनों जवाबों को जोड़ देंगे। यह तरीका हमें किसी भी बड़ी समस्या को छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटना सिखाता है। इससे हमारी ‘प्रक्रियात्मक स्मृति’ यानी चरणबद्ध तरीके से काम करने की आदत मजबूत होती है। एल्गोरिथम हमें सोचना सिखाता है कि पहले क्या करना है, फिर क्या करना है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में कोड लिखा जाता है – पहले एक छोटा काम, फिर उसके ऊपर दूसरा काम।

जो बच्चे एल्गोरिथमिक तरीके से सोचते हैं, उनके दिमाग का आगे का हिस्सा, जो योजना बनाने और निर्णय लेने का काम करता है, बेहतर ढंग से विकसित होता है। उनमें एक के बाद एक काम करने की क्षमता बढ़ती है और वे एक काम से दूसरे काम पर आसानी से ध्यान केंद्रित कर पाते हैं।

भाग 3: हमारी संस्कृति में गणित के तरीके

भारत की गणितीय परंपराएँ बहुत समृद्ध रही हैं। वैदिक गणित के सूत्र, जैसे ‘ऊर्ध्व-तिर्यग्भ्यम’ (ऊपर-नीचे और तिरछा), हमें एक साथ कई गणनाएँ करना सिखाते हैं। ‘निखिलम’ सूत्र हमें पैटर्न पहचानना सिखाता है। और प्राचीन काल में ‘कटपयादी’ प्रणाली में लोग संख्याओं को संस्कृत के श्लोकों में बदलकर याद रखते थे, जिससे उनकी याददाश्त मजबूत होती थी। ये सभी तरीके हमारे दिमाग को अलग-अलग ढंग से प्रशिक्षित करते थे।

दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अबैकस के अलग-अलग रूप थे। चीनी अबैकस (सुआनपान) की संरचना अलग थी, जो लोगों को 16 के आधार पर सोचने के लिए प्रेरित करती थी। वहीं रोमन अबैकस सरल था और दशमलव प्रणाली पर केंद्रित था। इन अलग-अलग डिजाइनों ने अलग-अलग सभ्यताओं में गणित के सीखने और व्यापार के तरीकों को आकार दिया।

भाग 4: दिमाग पर पड़ने वाला असर – विज्ञान की नजर से

वैज्ञानिकों ने अबैकस इस्तेमाल करने वालों और कैलकुलेटर इस्तेमाल करने वालों के दिमाग की जाँच की है। पता चला है कि अबैकस इस्तेमाल करने वालों के दिमाग का दायाँ हिस्सा, जो चीजों की जगह और उनके रूप को समझने का काम करता है, बहुत सक्रिय रहता है। उनका दिमाग गणना करते समय आँखों से देखने वाले हिस्से और हाथ हिलाने वाले हिस्से को भी सक्रिय करता है। वहीं कैलकुलेटर इस्तेमाल करने वालों के दिमाग का बायाँ हिस्सा, जो भाषा और तर्क का काम करता है, ज्यादा सक्रिय रहता है।

अबैकस के अभ्यास का असर सिर्फ गणित तक सीमित नहीं रहता। इससे बच्चों की जगह को समझने की क्षमता, याददाश्त और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता भी बढ़ती है। वहीं एल्गोरिथमिक सोच से बच्चों में तार्किक सोच, व्यवस्थित ढंग से काम करने की क्षमता और पैटर्न पहचानने का कौशल विकसित होता है।

भाग 5: आज की शिक्षा में क्या करना चाहिए

बच्चों के दिमाग का सही विकास करने के लिए हमें अबैकस और एल्गोरिथम दोनों को सिखाना चाहिए। छोटे बच्चों (4 से 7 साल) को पहले अबैकस के माध्यम से संख्याओं का ठोस ज्ञान देना चाहिए। उन्हें मनकों को छूकर, हिलाकर गिनती सिखानी चाहिए। 8 से 12 साल के बच्चों को धीरे-धीरे एल्गोरिथमिक तरीके से गणना सिखानी चाहिए, लेकिन साथ ही अबैकस का अभ्यास जारी रखना चाहिए। 13 साल से बड़े बच्चों को प्रोग्रामिंग और जटिल एल्गोरिदम सिखाए जा सकते हैं।

हम तकनीक का उपयोग करके इस सीखने की प्रक्रिया को और बेहतर बना सकते हैं। पहले बच्चे भौतिक अबैकस से शुरुआत करें, फिर डिजिटल अबैकस ऐप्स का उपयोग करें, फिर दृश्य प्रोग्रामिंग सीखें और अंत में वास्तविक कोड लिखना सीखें। आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से हम हर बच्चे की सीखने की शैली के अनुसार शिक्षण दे सकते हैं।

भाग 6: अलग-अलग सीखने वाले बच्चों के लिए फायदे

हर बच्चा अलग ढंग से सीखता है। जो बच्चे देखकर बेहतर सीखते हैं (दृश्य शिक्षार्थी), उनके लिए अबैकस बहुत उपयोगी है क्योंकि इसमें वे संख्याओं को मनकों के रूप में देख सकते हैं। जो बच्चे हाथों से कुछ करके सीखते हैं (गतिज शिक्षार्थी), उनके लिए भी अबैकस अच्छा है क्योंकि उन्हें मनके हिलाने पड़ते हैं। और जो बच्चे तर्क और क्रम से सीखते हैं (तार्किक शिक्षार्थी), उनके लिए एल्गोरिथम बेहतर है।

इन तरीकों का उपयोग कुछ विशेष जरूरतों वाले बच्चों की मदद के लिए भी किया जा सकता है। जिन बच्चों को गणित सीखने में कठिनाई होती है (डिस्केलकुलिया), उनके लिए अबैकस मददगार हो सकता है। जिन बच्चों का ध्यान आसानी से भटक जाता है (एडीएचडी), उनके लिए एल्गोरिथमिक संरचना फायदेमंद हो सकती है क्योंकि यह उनके विचारों को व्यवस्थित करने में मदद करती है।

भाग 7: भविष्य की ओर – क्वांटम सोच और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस

आने वाला समय और भी रोमांचक होने वाला है। भविष्य में हमें ‘क्वांटम एल्गोरिथम’ सोचने होंगे, यानी एक साथ कई संभावनाओं के बारे में सोचना होगा। हमें तंत्रिका नेटवर्क की तरह सोचना होगा, जहाँ हम गलतियों से सीखते हुए आगे बढ़ें। हम प्रकृति से प्रेरित होकर नई गणना विधियाँ विकसित करेंगे।

शिक्षा के क्षेत्र में भी बड़े बदलाव आएँगे। अब हम ऐसी सीखने की प्रणालियाँ बना सकते हैं जो हर बच्चे की क्षमता के अनुसार खुद को ढाल लें। हम मिश्रित वास्तविकता (mixed reality) के जरिए अबैकस प्रशिक्षण दे सकते हैं। हम ऐसे एआई ट्यूटर्स बना सकते हैं जो हर बच्चे की सोचने की शैली को समझकर उसे पढ़ाएँ।

भाग 8: घर और स्कूल में कैसे लागू करें

माता-पिता और शिक्षक बच्चों के लिए एक सरल दिनचर्या बना सकते हैं। सोमवार को 5 मिनट अबैकस का अभ्यास और 10 मिनट सरल एल्गोरिदम सीखना। मंगलवार को 5 मिनट मानसिक अबैकस की कल्पना और 10 मिनट पैटर्न पहचानने का अभ्यास। बुधवार को 15 मिनट वास्तविक जीवन की समस्याओं के लिए एल्गोरिदम डिजाइन करना। गुरुवार को 15 मिनट दोनों तरीकों से तेज गणना का अभ्यास। और शुक्रवार को 15 मिनट अबैकस का उपयोग करके एल्गोरिदम के जवाबों की जाँच करना।

वयस्क भी इन तरीकों से लाभ उठा सकते हैं। अबैकस का उपयोग ध्यान लगाने और तनाव कम करने के लिए किया जा सकता है। एल्गोरिथम जर्नलिंग करके हम अपनी समस्या-समाधान प्रक्रिया को बेहतर बना सकते हैं। और नई गणना विधियाँ सीखकर हम अपने दिमाग को चुस्त-दुरुस्त रख सकते हैं।

निष्कर्ष: एक सुंदर सामंजस्य

अबैकस से एल्गोरिथम तक का सफर पुराने को छोड़कर नया अपनाने की कहानी नहीं है। बल्कि यह हमारी सोचने की क्षमताओं के विस्तार की कहानी है। अबैकस हमें स्थान और रूप के माध्यम से सोचना सिखाता है, जबकि एल्गोरिथम हमें समय और क्रम के माध्यम से सोचना सिखाता है। असली गणितीय महारत तब आती है जब हम इन दोनों तरीकों को एक साथ इस्तेमाल करना सीखते हैं।

आज हमारे पास एक अद्भुत अवसर है कि हम बच्चों को मनकों और कोड दोनों में सोचना सिखाएँ। हम उनके दिमाग को इतना लचीला बना सकते हैं कि वे ठोस और अमूर्त, स्थानिक और क्रमिक, पुरानी बुद्धिमत्ता और भविष्य की संभावनाओं के बीच आसानी से आ-जा सकें।

एक अच्छा गणितीय दिमाग वह नहीं है जो सबसे तेज गणना करता है, बल्कि वह है जो सही समस्या के लिए सही उपकरण चुन सकता है, जो विभिन्न गणितीय भाषाओं के बीच अनुवाद कर सकता है, और जो संख्याओं को दृश्य चित्र और चरणबद्ध निर्देश दोनों के रूप में समझ सकता है।

जैसे हम प्राचीन और आधुनिक, भौतिक और डिजिटल के इस मिलन बिंदु पर खड़े हैं, हम सिर्फ गणना के तरीके नहीं सिखा रहे हैं – हम सोचने के नए तरीके विकसित कर रहे हैं। हम ऐसे दिमाग बना रहे हैं जो मनके सरकाने की सरल सुंदरता की सराहना कर सकते हैं और साथ ही उस कोड को भी लिख सकते हैं जो एक दिन क्वांटम कंप्यूटर डिजाइन करेगा।

भविष्य उनका नहीं है जो अबैकस को एल्गोरिथम के लिए छोड़ देते हैं। भविष्य उनका है जो अपने दिमाग में अबैकस की तस्वीर रखते हैं और अपने हाथों से एल्गोरिदम लिखते हैं। यही हमारे गणितीय पूर्वजों की सच्ची विरासत है – न सिर्फ उनके तरीके, बल्कि नई चुनौतियों के लिए उन तरीकों को विकसित करने की बुद्धिमत्ता।

तो चलिए, हम दोनों सिखाएँ। हम मनके का सम्मान करें और कंप्यूटर बाइट का भी। क्योंकि इन दोनों के मिलन में सिर्फ बेहतर गणितज्ञ ही नहीं, बल्कि अधिक संपूर्ण मानव विचारक बनते हैं – वे लोग जो पुरानी बुद्धिमत्ता और भविष्य की संभावनाओं दोनों को अपने सुंदर ढंग से प्रशिक्षित, गणितीय रूप से चुस्त दिमाग में समेट सकते हैं।

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