भगवद गीता अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग
भगवद गीता अध्याय 1 श्लोक 14 से 17 – पिछले श्लोकों (1.10-1.13) में हमने देखा कि कैसे कौरव सेना की ओर से भीष्म पितामह के शंखनाद के बाद समस्त कौरव योद्धाओं ने अपने-अपने शंख और वाद्य बजाकर युद्ध की घोषणा कर दी। वह ध्वनि इतनी भीषण और गगनभेदी थी कि पूरा वातावरण युद्धमय हो गया।
अब श्लोक 1.14 से 1.16 में उस महत्वपूर्ण क्षण का वर्णन है जब पांडव सेना की ओर से प्रत्युत्तर दिया जाता है। यह खंड विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें स्वयं भगवान श्रीकृष्ण और पांचों पांडवों के शंखनाद का वर्णन है। कौरवों के शंखनाद के ठीक बाद, भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन अपने रथ पर खड़े होकर अपने दिव्य शंख बजाते हैं। उसके बाद क्रमशः भीम, युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव भी अपने-अपने शंख बजाते हैं।
इन श्लोकों की विशेषता यह है कि प्रत्येक पांडव के शंख का एक विशिष्ट नाम है – पाञ्चजन्य, देवदत्त, पौण्ड्र, अनन्तविजय, सुघोष और मणिपुष्पक। यह केवल शंखों के नाम नहीं हैं, बल्कि प्रत्येक शंख उस योद्धा के व्यक्तित्व, गुणों और शक्ति का प्रतीक है। यह शंखनाद केवल युद्ध की घोषणा नहीं था, बल्कि यह दर्शाता है कि धर्म की स्थापना के लिए पांडव पूरी तरह तैयार हैं और उनके साथ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण भी हैं।
इस प्रकार, श्लोक 1.14 से 1.16 पांडव सेना के उत्साह, एकता और आत्मविश्वास का प्रतीक हैं। आइए, इन श्लोकों को विस्तार से समझते हैं:
श्लोक 1.14
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः।।
अनुवाद:
उसके बाद, श्वेत घोड़ों से युक्त उस विशाल रथ पर स्थित माधव (श्रीकृष्ण) और पाण्डव (अर्जुन) ने भी अपने-अपने दिव्य शंख बजाए ।
स्पष्टीकरण:
यह श्लोक युद्ध के ठीक पूर्व के क्षण का वर्णन करता है। जब कौरव सेना की ओर से भीष्म और अन्य योद्धाओं ने शंखनाद किया, तो उसके तुरंत बाद पांडव सेना की ओर से भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन ने अपने शंख बजाए। यहाँ ‘माधव’ (लक्ष्मी के पति) और ‘पाण्डव’ (धर्मराज युधिष्ठिर के अनुज) शब्द महत्वपूर्ण हैं। यह शंखनाद केवल युद्ध की घोषणा नहीं था, बल्कि यह दर्शाता है कि धर्म की स्थापना के लिए स्वयं भगवान पांडवों के साथ हैं। यह घटना कौरवों के शंखनाद की प्रतिध्वनि थी, जो दोनों पक्षों की ओर से युद्ध की पूर्ण तैयारी को प्रदर्शित करती है।
उदाहरण:
कल्पना कीजिए, एक फुटबॉल मैच में जब विपक्षी टीम ने गोल करने के बाद जश्न मनाया, तो उनके समर्थकों ने जोरदार नारे लगाए। उसके तुरंत बाद, दूसरी टीम के कप्तान और स्टार खिलाड़ी मैदान पर उतरते हैं और अपने समर्थकों का उत्साह बढ़ाने के लिए एक शानदार प्रदर्शन करते हैं, जिससे पूरे स्टेडियम में उनके समर्थकों का जोश दोगुना हो जाता है।
कब उपयोग करें:
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टीम भावना के क्षणों में: जब आपकी टीम को किसी प्रतिस्पर्धी के दबाव का सामना करना पड़े और नेता के रूप में आपको टीम का उत्साह बढ़ाने की आवश्यकता हो।
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आत्मविश्वास प्रदर्शन में: यह श्लोक सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी आत्मविश्वास और साहस के साथ आगे बढ़ना चाहिए, जैसे कृष्ण और अर्जुन ने कौरवों के शंखनाद के तुरंत बाद अपना शंख बजाया।
श्लोक 1.15
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः।।
अनुवाद:
हृषीकेश (इन्द्रियों के स्वामी) भगवान श्रीकृष्ण ने ‘पाञ्चजन्य’ नामक शंख बजाया, धनंजय अर्जुन ने ‘देवदत्त’ शंख बजाया और भीमकर्मा (भीषण कर्म करने वाले) वृकोदर भीम ने अपना महाशंख ‘पौण्ड्र’ बजाया ।
स्पष्टीकरण:
इस श्लोक में पांडव सेना के तीन प्रमुख योद्धाओं के शंखों के नामों का उल्लेख है। ‘हृषीकेश’ का अर्थ है इन्द्रियों के स्वामी, जो भगवान कृष्ण की सर्वोच्च स्थिति को दर्शाता है। ‘धनंजय’ अर्जुन का विशेषण है, जो धन और वैभव पर विजय पाने वाले हैं। ‘भीमकर्मा’ और ‘वृकोदर’ भीम के विशेषण हैं, जो उनके अदम्य साहस और भीषण कार्यों को दर्शाते हैं। प्रत्येक शंख की अपनी अलग पहचान और ध्वनि थी – पाञ्चजन्य, देवदत्त और पौण्ड्र। यह श्लोक दर्शाता है कि कैसे विभिन्न गुणों वाले योद्धा एक साथ मिलकर एक लक्ष्य के लिए कार्य कर रहे थे।
उदाहरण:
किसी क्रिकेट टीम के तीन प्रमुख खिलाड़ी – एक अनुभवी कप्तान (कृष्ण), एक बेहतरीन बल्लेबाज (अर्जुन) और एक तेज गेंदबाज (भीम) – मैच की शुरुआत में अपने-अपने अंदाज में टीम का उत्साह बढ़ाते हैं। प्रत्येक की अपनी विशेषता है, लेकिन सबका लक्ष्य एक ही है – टीम की जीत।
कब उपयोग करें:
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विविधता में एकता के प्रतीक के रूप में: जब हम यह समझाना चाहें कि एक टीम में अलग-अलग क्षमताओं वाले लोग होते हैं, लेकिन सब एक सामान्य लक्ष्य के लिए कार्य करते हैं।
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नेतृत्व पाठ के रूप में: यह श्लोक बताता है कि एक सफल टीम में हर सदस्य की अपनी विशिष्ट भूमिका होती है और सभी का योगदान महत्वपूर्ण होता है।
श्लोक 1.16
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ।।
अनुवाद:
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने ‘अनन्तविजय’ नामक शंख बजाया तथा नकुल और सहदेव ने ‘सुघोष’ और ‘मणिपुष्पक’ नामक शंख बजाए ।
स्पष्टीकरण:
इस श्लोक में पांडवों के शेष तीन भाइयों – युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव – के शंखनाद का वर्णन है। युधिष्ठिर को ‘राजा’ और ‘कुन्तीपुत्र’ कहकर संबोधित किया गया है, जो उनके राजसी धर्म और कुन्ती के ज्येष्ठ पुत्र होने का गौरव दर्शाता है। यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि संजय ने युधिष्ठिर को ‘कुन्तीपुत्र’ कहकर यह स्पष्ट किया है कि नकुल और सहदेव माद्री के पुत्र हैं, जबकि युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन कुन्ती के पुत्र हैं। ‘अनन्तविजय’ (अनन्त विजय) शंख का नाम बहुत अर्थपूर्ण है, जो युधिष्ठिर की धर्म की विजय में अटूट आस्था को दर्शाता है ।
उदाहरण:
एक स्कूल प्रोजेक्ट में पाँच छात्रों की एक टीम है। टीम लीडर (युधिष्ठिर) ने पूरी योजना बनाई, दो छात्रों (भीम और अर्जुन) ने मुख्य कार्य किया, और बाकी दो छात्रों (नकुल और सहदेव) ने सहायक भूमिका निभाई। प्रोजेक्ट प्रेजेंटेशन के समय, सभी पाँचों ने मिलकर अपने-अपने हिस्से का काम शानदार ढंग से प्रस्तुत किया और टीम ने सफलता प्राप्त की। यहाँ हर सदस्य का योगदान अलग था, लेकिन सबका लक्ष्य एक था।
कब उपयोग करें:
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परिवार या टीम के सभी सदस्यों के महत्व को समझाने के लिए: जब हम यह बताना चाहें कि किसी भी संगठन या परिवार में हर सदस्य, चाहे उसकी भूमिका छोटी या बड़ी हो, का अपना विशेष महत्व होता है।
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एकता के प्रतीक के रूप में: यह श्लोक पांचों पांडवों की एकता को दर्शाता है, जो उनकी सबसे बड़ी शक्ति थी। यह हमें सिखाता है कि एकजुट परिवार या टीम को कोई नहीं हरा सकता।
श्लोक 1.17
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः।।
अनुवाद:
और काशीराज (काशी नरेश), महान धनुर्धर शिखण्डी, महारथी धृष्टद्युम्न, विराट राजा तथा अपराजित सात्यकि (भी शंख बजा रहे थे)।
स्पष्टीकरण:
इस श्लोक में संजय पांडव सेना के अन्य महत्वपूर्ण योद्धाओं का वर्णन कर रहे हैं, जिन्होंने युद्ध के प्रारंभ में अपने शंख बजाए। ये सभी योद्धा अत्यंत पराक्रमी और अपने-अपने क्षेत्रों में प्रसिद्ध थे:
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काशीराज: काशी नरेश, जो पांडवों के पक्ष में युद्ध कर रहे थे। उन्हें ‘परमेष्वास’ (अति उत्तम धनुर्धर) कहकर संबोधित किया गया है।
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शिखण्डी: यह योद्धा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इनके कारण ही भीष्म पितामह का अंत संभव हो सका। शिखण्डी पूर्व जन्म में अम्बा थीं, जिन्होंने भीष्म से बदला लेने का संकल्प लिया था। भीष्म ने प्रतिज्ञा की थी कि वे कभी किसी स्त्री पर अस्त्र नहीं चलाएंगे, और शिखण्डी को पूर्व जन्म की स्त्री मानकर वे इनके सामने शस्त्र नहीं उठाते थे।
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धृष्टद्युम्न: द्रुपद राजा के पुत्र और द्रौपदी के भाई। इनका जन्म द्रुपद द्वारा कराए गए यज्ञ से हुआ था, जिसका एकमात्र उद्देश्य द्रोणाचार्य का वध करना था। ये पांडव सेना के सेनापति थे।
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विराट: विराट नरेश, जिनके राज्य में पांडवों ने अपना अज्ञातवास बिताया था। अज्ञातवास के दौरान उनकी सहायता करने के कारण वे पांडवों के प्रति कृतज्ञ थे और उनके साथ युद्ध में शामिल हुए।
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सात्यकि (यादव वंशी): ये श्रीकृष्ण के परम मित्र और सखा थे। यादव कुल में होने के बावजूद उन्होंने धर्म के पक्ष में रहकर पांडवों का साथ दिया। इन्हें ‘अपराजित’ (कभी न हारने वाला) कहकर संबोधित किया गया है।
यह श्लोक दर्शाता है कि पांडवों के पक्ष में केवल उनके भाई ही नहीं, बल्कि अनेक महान राजा और योद्धा भी धर्म की रक्षा के लिए एकत्र हुए थे।
उदाहरण:
किसी महत्वपूर्ण सामाजिक आंदोलन या परियोजना में केवल एक परिवार या समूह के लोग ही नहीं, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित व्यक्ति भी शामिल होते हैं। जैसे किसी पर्यावरण बचाओ अभियान में फिल्म अभिनेता, वैज्ञानिक, खिलाड़ी, समाजसेवी और आम नागरिक सभी एक साथ आते हैं। हर व्यक्ति की अपनी विशेषता होती है और सब मिलकर एक लक्ष्य के लिए कार्य करते हैं।
कब उपयोग करें:
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विविध प्रतिभाओं के संग्रह के प्रतीक के रूप में: जब हम यह समझाना चाहें कि किसी महान कार्य के लिए विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिभाओं का एकत्र होना आवश्यक है।
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सामूहिक शक्ति के प्रदर्शन में: यह श्लोक सिखाता है कि किसी उद्देश्य की सफलता के लिए अकेले कुछ लोगों का प्रयास पर्याप्त नहीं होता, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों का सहयोग आवश्यक है।
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धर्म की रक्षा के लिए एकजुटता के प्रतीक के रूप में: यह दर्शाता है कि जब उद्देश्य धर्म (सत्य एवं न्याय) होता है, तो दूर-दूर से लोग उसका साथ देने के लिए आते हैं।
नीचे संबंधित लिंक दिए गए हैं।
1)भगवद गीता अध्याय 1 श्लोक 10 से 13
2)भगवद गीता अध्याय 1 श्लोक 9 से 12
3)Bhagavad Gita श्लोक 5-8 व्याख्या सहित
4)Bhagavad Gita श्लोक 1-4 व्याख्या सहित